पूज्य बापूजी के दिव्य दर्शन और भारतीय संस्कृति का सर्वहितकारी ज्ञान

नारायण नारायण नारायण नारायण

Friday, June 4, 2010

श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण -YogVashisht Maharamayan
उपशमप्रकरण (पञ्चम)
त्रयोदशस्सर्ग

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार जनक की नाईं अपने आपसे आपको विचार करो और पीछे जो विदितवेद पुरुषों ने किया है उसी प्रकार तुम भी करके निर्वाण हो जाओ । जो बुद्धि मान पुरुष है और जिनका यह अन्त का जन्म है वे राजस-सात्त्विकी पुरुष आप ही परमपद को प्राप्त होते हैं । जब तक अपने आपसे आत्मदेव प्रसन्न न हो तब तक इन्द्रियरूपी शत्रुओं के जीतने का यत्न करो और जब आत्मदेव जो सर्ववत् परमात्मा ईश्वरों का भी ईश्वर है प्रसन्न होगा तो आप ही स्वयंप्रकाश देखेगा और सब दोष दृष्टि क्षीण हो जायगी । मोहरूपी बीज को जो मुट्ठी भर बोता था और नाना प्रकार की आपदारूपी वर्षा से महामोह की बेलि जो होती दृष्टि आती थी वह नष्ट हो जाती है! परमात्मा का साक्षात्कार होता तब भ्रान्ति दृष्टि नहीं आती । हे रामजी! तुम सदा बोध से आत्मपद में स्थित हो, जनकवत् कर्मों का आरम्भ करो और ब्रह्म लक्षवान् होकर जगत् में विचरो तब तुमको खेद कुछ न होगा । जब नित्य आत्मविचार होता है तब परमदेव आपही प्रसन्न होता है और उसके साक्षात्कार हुए से तुम चञ्चलरूपी संसारीजनों को देखकर जनक की नाईं हँसोगे । हे रामजी! संसार के भय से जो जीव भयभीत हुए हैं उनको अपनी रक्षा करने को अपना ही प्रयत्न चाहिये और दैव अथवा कर्म वा धन, बान्धवों से रक्षा नहीं होती । जो पुरुष दैव को ही निश्चय कर रहे हैं पर शास्त्रविरुद्ध कर्म करते हैं और संकल्प विकल्प में तत्पर होते हैं वे मन्द बुद्धि हैं उनके मार्ग की ओर तुम न जाना उनकी बुद्धि नाश करती है, तुम परम विवेक का आश्रय करो और अपने आपको आपसे देखो । बैराग्यवान् शुद्ध बुद्धि से संसार समुद्र को तर जाता है । यह मैंने तुमसे जनक का वृत्तांत कहा है-जैसे आकाश से फल गिर पड़े तैसे ही उसको सिद्धों के विचार में ज्ञान की प्राप्ति हुई । यह विचार ज्ञानरूपी वृक्ष की मञ्जरी है । जैसे अपने विचार से राजा जनक को आत्मबोध हुआ तैसे ही तुमको भी प्राप्त होगा । जैसे सूर्यमुखी कमल सूर्य को देखकर प्रसन्न होता है तैसे ही इस विचार से तुम्हारा हृदय प्रफुल्लित हो आवेगा और मन का मननभाव जैसे बरफ का कणका सूर्य से तप्त हो गल जाता है शान्त हो जावेगा । जब अहं’ ‘त्वंआदि रात्रि विचाररूपी सूर्य से क्षीण हो जावेगी तब परमात्मा का प्रकाश साक्षात् होगा, भेदकल्पना नष्ट हो जावेगी और अनन्तब्रह्माण्ड में जो व्यापक आत्मतत्त्व है । वह प्रकाशित होगा । जैसे अपने विचार से जनक ने अहंकाररूपी वासना का त्याग किया है तैसे ही तुम भी विचार करके अहंकार-रूपी वासना का त्याग किया है तैसे ही तुम भी विचार करके अहंकाररूपी वासना का त्याग करो अहंकाररूपी मेघ जब नष्ट होगा और चित्ताकाश निर्मल होगा तब आत्मरूपी सूर्य प्रकाशित होगा । जब तक अहंकाररूपी मेघ आवरण है तबतक आत्मरूपी सूर्य नहीं भासता । विचाररूपी वायु से जब अहंकाररूपी मेघ नाश हो तब आत्मरूपी सूर्य प्रकट भासेगा । हे रामजी! ऐसे समझो कि मैं हूँ न कोई और है, न नास्ति है, न अस्ति है, जब ऐसी भावना दृढ़ होगी तब मन शा न्त हो जावेगा और हेयोपादेय बुद्धि जो इष्ट पदार्थों मे होती है उसमें न डूबोगे । इष्ट अनिष्ट के ग्रहण त्याग में जो भावना होती है यही मन का रूप है और यही बन्धन का कारण है- इससे भिन्न बन्धन कोई नहीं । इससे तुम इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट में हेयो पादेय बुद्धि मत करो और दोनों के त्यागने से जो शेष रहे उसमें स्थित हो । इष्ट अनिष्ट की भावना उसकी की जाती है जिसको हेयोपादेय बुद्धि नहीं होती और जबतक हेयो पादेय बुद्धि क्षीण नहीं होती तबतक समता भाव नहीं उपजता । जैसे मेघ के नष्ट हुए बिना चन्द्रमा की चाँदनी नहीं भासती तैसे ही जबतक पदार्थों में इष्ट अनिष्ट बुद्धि है और मन लोलुप होता है तबतक समता उदय नहीं होती । जबतक युक्त अयुक्त लाभ अलाभ इच्छा नहीं मिटती तबतक शुद्ध समता और निरसता नहीं उपजती । एक ब्रह्मतत्त्व जो निरामयरूप और नानात्व से रहित है उसमें युक्त क्या और अयुक्त क्या? जब तक इच्छा- अनिच्छा और वाञ्छित-अवाञ्छित यह दोनों बातें स्थित हैं अर्थात् फुरते और क्षोभ करते हैं तबतक सौम्यताभाव नहीं होता । जो हेयोपादेय बुद्धि से रहित ज्ञानवान् है उस पुरुष को यह शक्ति आ प्राप्त होती है-जैसे राजा के अन्तःपुर में पटु (चतुर) रानी स्थित होती हैं । वह शक्ति यह है, भोगों में निरसता, देहाभिमान से रहित निर्भयता, नित्यता, समता, पूर्णआत्मा-दृष्टि, ज्ञाननिष्ठा, निरिच्छता, निरहंकारता आपको सदा अकर्त्ता जानना, इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता, निर्विकल्पता, सदा आनन्द- स्वरूप रहना,धैर्य से सदा एकरस रहना, स्वरूप से भिन्न वृत्ति न फुरना, सब जीवों से मैत्रीभाव, सत्यबुद्धि, निश्चयात्मकरूप से तुष्टता, मुदिता और मृदुभाषणा,इतनी शक्ति हेयोपादेय से रहित पुरुष को आ प्राप्त होती है । हे रामजी! संसार के पदार्थों की ओर जो चित्त धावता है उसको वैराग्य से उलटाके खैंचना-जैसे पुल से जल के वेग का निवारण होता है तैसे ही जगत् से रोककर मन को आत्मपद में लगाने से आत्मभाव प्रकाशता है । इससे हृदय से सब वासना का त्याग करो और बाहर से सब क्रिया में रहो । वेग चलो, श्वास लो और सर्वदा, सब प्रकार चेष्टा करो, पर सर्वदा सब प्रकार की वासना त्याग करो । संसाररूपी समुद्र में वासनारूपी जल है और चिन्तारूपी सिवार है, उस जल में तृष्णावान् रूपी मच्छ फँसे हैं । यह विचार जो तुमसे कहा है उस विचाररूपी शिला से बुद्धि को तीक्ष्ण करो और इस जाल को छेदो तब संसार से मुक्त होगे संसाररूपी वृक्ष का मूल बीज मन है । ये वचन जो कहे हैं-उनको हृदय में धरकर धैर्यवान हो तब आधि व्याधिदुःखों से मुक्त होगे । मन से मन को छेदो, जो बीती है उसका स्मरण न करो और भविष्यत् की चिन्ता न करो, क्योंकि वह असत्यरूप है और वर्तमान को भी असत्य जानके उसमें बिचरो । जब मन से संसार का विस्मरण होता है तब मन में फिर न फुरेगा । मन असत्यभाव जानके चलो, बैठो, श्वाश लो, निश्वास करो, उछलो, सोवो, सब चेष्टा करो परन्तु भीतर सब असत्यरूप जानो तब खेद न होगा । अहं’ ‘ममरूपी मल का त्याग करो प्राप्ति में बिचरो अथवा राज आ प्राप्त हो उसमें बिचरो परन्तु भीतर से इसमें आस्था न हो । जैसे आकाश का सब पदार्थों में अन्वय है परन्तु किसी से स्पर्श नहीं करता, तै से ही बाहर कार्य करो परन्तु मन से किसी में बन्धायमान न हो तुम चेतनरूप अजन्मा महेश्वर पुरुष हो, तुम से भिन्न कुछ नहीं और सबमें व्याप रहे हो । जिस पुरुष को सदा यही निश्चय रहता है उसको संसार के पदार्थों चलायमान नहीं कर सकते और जिनको संसार में आसक्त भावना है और स्वरूप भूले हैं उनको संसार के पदार्थों से विकार उपजता है और हर्ष, शोक और भय खींचते हैं, उससे वे बाँधे हुए हैं । जो ज्ञानवान् पुरुष राग द्वेष से रहित हैं उनको लोहा, बट्टा, (ढेला) पाषाण और सुवर्ण सब एक समान है । संसार वासना के ही त्यागने का नाम मुक्ति है । हे रामजी! जिस पुरुष को स्वरूप में स्थिति हुई है और सुख दुःख में समता है वह जो कुछ करता, भोगता, देता, लेता इत्यादिक क्रिया करता है सो करता हुअ भी कुछ नहीं करता । वह यथा प्राप्त कार्य में बर्तता है । और उसे अन्तःकरण में इष्ट अनिष्ट की भावना नहीं फुरती और कार्य में रागद्वेषवान् होकर नहीं डूबता । जिसको सदा यह निश्चय रहता है कि सर्वचिदाकाशरूप है और जो भोगों के मनन से रहित है वह समता भाव को प्राप्त होता है । हे रामजी! मन जड़रूप है और आत्मा चेतनरूप है, उसी चेतन की सत्ता से जीव पदार्थों को ग्रहण करता है इसमें अपनी सत्यता कुछ नहीं । जैसे सिंह के मारे हुए पशु बिल्ली भी खाने जाती है, उसको अपना बल कुछ भी नहीं, तैसे ही चेतन के बल से मन दृश्य का आश्रय करता है, आप असत्यरूप है चेतन की सत्ता पाकर जीता है, संसार के चिन्तवन को समर्थ होता है और प्रमाद से चिन्ता से तपायमान होता है । यह वार्त्ता प्रसिद्ध है कि मन जड़ है और चेतनरूपी दीपक से प्रकाशित है । चेतन सत्ता से रहित सब समान है और आत्म सत्ता से रहित उठ भी नहीं सकता । आत्मसत्ता को भुलाकर जो कुछ करता है उस फुरने को बुद्धिमान कलना कहते हैं । जब वही कलना शुद्ध चेतनरूप आपको जानती है तब आत्मभाव को प्राप्त होता है और प्रमाद से रहित आत्मरूप होता है । चित्तकला जब चैत्य दृश्य से अस्फुर होती है उसका नाम सनातन ब्रह्म होता है और जब चैत्य के साथ मिलती है तब उसका नाम कलना होता है, स्वरूप से कुछ भिन्न नहीं केवल ब्रह्मतत्त्व स्थित है और उसमें भ्रान्ति से मन आदि भासते हैं । जब चेतनसत्ता दृश्य के सम्मुख होती है तब वही कलनारूप होती है और अपने स्वरूप के विस्मरण किये से और संकल्प की ओर धावने से कलना कहाती है । वह आपको परिच्छिन्न जानती है उससे परिच्छिन्न हो जाती है और हेयोपादेय धर्मिणी होती है । हे रामजी! चित्तसत्ता अपने ही फुरने से जड़ता को प्राप्त हुई है और जब तक विचार करके न जगावे तब तक स्वरूप में नहीं जागती इसी कारण सत्य शास्त्रों के विचार और वैराग से इन्द्रियों का निग्रह करके अपनी कलना को आप जगावो सब जीवों की कलना विज्ञान और सम करके जगाने से ब्रह्म तत्त्व को प्राप्त होती है और इससे भिन्न मार्ग से भ्रमता रहता है । मोहरूपी मदिरा से जो पुरुष उन्मत्त होता है वह विषयरूपी गढ़े में गिरता है । सोई हुई कलना आत्मबोध से नहीं जगाते अप्रबोध ही रहते हैं सो चित्त कलना जड़ रहती है, जो भासती है तो भी असत्यरूप है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो संकल्प से कल्पित न हो, इससे तुम अजड़धर्मा हो जाओ । कलना जड़ उपलब्धरूपिणी है और परमार्थसत्ता से विकासमान होती है-जैसे सूर्य से कमल विकासमान होता है । जैसे पाषाण की मूर्ति से कहिये कि तू नृत्य कर तो वह नहीं करती क्योंकि जड़रूप है, तैसे ही देह में जो कलना है वह चेतन कार्य नहीं कर सकती । जैसे मूर्ति का लिखा हुआ राजा गुर गुर शब्द करके युद्ध नहीं कर सकता और मूर्ति का चन्द्रमा औषध पुष्ट नहीं कर सकता तैसे ही कलना जड़ कार्य नहीं कर सकती । जैसे निरवयव अंगना से आलिंगन नहीं होता, संकल्प के रचे आकाश के वन की छाया से नीचे कोई नहीं बैठता और मृगतृष्णा के जल से कोई तृप्त नहीं होता तैसे ही जड़रूप मन क्रिया नहीं कर सकता । जैसे सूर्य की धूप से मृग तृष्णा की नदी भासती है तैसे ही चित्तकलना के फुरने से जगत् भासता है । शरीर में जो स्पन्दशक्ति भासती है वही प्राणशक्ति है और प्राणों से ही बोलता, चलता, बैठता है । ज्ञानरूप संवित् जो आत्मतत्त्व है उससे कुछ भिन्न नहीं, जब संकल्पकला फुरती है तब अहं’ ‘त्वंइत्यादिक कलना से वही रूप हो जाता है और जब आत्मा और प्राण का फुरना इकट्ठा होता है अर्थात् प्राणों से चेतन संवित् मिलता है तब उसका नाम जीव होता है । और बुद्धि, चित्त, मन, सब उसी के नाम है । सब संज्ञा अज्ञान से कल्पित होती हैं । अज्ञानी को जैसे भासती है, तैसे ही उसको है, परमार्थ से कुछ हुआ नहीं, न मन है, न बुद्धि है, न शरीर है केवल आत्मामात्र अपने आप में स्थित है-द्वैत नहीं । सब जगत् आत्मरूप है और काल क्रिया भी सब अल्परूप है, आकाश से भी निर्मल, अस्ति नास्ति सब वही रूप है और द्वितीय फुरने से रहित है इस कारण है और नहीं ऐसा स्थित है और सब रूप से सत्य है । आत्मा सब पदों से रहित है इस कारण असत्य की नाईं है और अनुभवरूप है इससे सत्य है और सब कलनाओं से रहित केवल अनुभवरूप है । ऐसे अनुभव का जहाँ ज्ञान होता है वहाँ मन क्षीण हो जाता है- जैसे जहाँ सूर्य का प्रकाश होता है वहाँ अन्धकार क्षीण हो जाता है । जब आत्मसत्ता में संवित् करके इच्छा फुरती है तो वह संकल्प के सम्मुख हुई थोड़ी भी बड़े विस्तार को पाती है, तब चित्तकला को आत्मस्वरूप विस्मरण हो जाता है, जन्मों की चेष्टा से जगत् स्मरण हो आता है और परम पुरुष को संकल्प से तन्मय होने करके चित्त नाम कहाता है । जब चित्तकला संकल्प से रहित होती है तब मोक्षरूप होता है । चित्तकला फुरने का नाम चित्त और मन कहते हैं और दूसरी वस्तु कोई नहीं । एकता मात्र ही चित्त का रूप है और सम्पूर्ण संसार का बीज मन है । संकल्प के सम्मुख हो करके चेतन संवित् का नाम मन होता है और निर्विकल्प जो चित्तसत्ता है वह संकल्प करके मलीन होती है तब उसको कलना कहते हैं । वही मन जब घटादिक की नाईं परिच्छिन्न भेद को प्राप्त होता हे तब क्रियाशक्ति से अर्थात् प्राण और ज्ञान शक्ति से मिलता है, उस संयोग का नाम संकल्प विकल्प का कर्त्ता मन होता है । वही जगत् का बीज है और उसके लीन करमने के दो उपाय हैं-एक तत्त्वज्ञान दूसरा प्राणों का रोकना । जब प्राणशक्ति का निरोध होता है तब भी मन लीन हो जाता है और जब सत्य शास्त्रों के द्वारा ब्रह्म तत्त्व का ज्ञान होता है तो भी लीन हो जाता है । प्राण किसका नाम है और मन किसको कहते हैं? हृदयकोश से निकलकर जो बाहर आता है और फिर बाहर से भीतर आता है वह प्राण है, शरीर बैठा है और वासना से जो देश देशान्तर भ्रमताहै उसका नाम मन होता है, उसको वैराग और योगाभ्यास से वासना से रहित करना और प्राणवायु को स्थित करना ये दोनों उपाय हैं। हे रामजी! जब तत्त्वज्ञान होता है तब मन स्थित हो जाता है क्योंकि प्राण और चित्तकला का आपस में वियोग होता है और जब प्राण स्थित होता है तब भी मन स्थिर हो जाता है, क्योंकि प्राण स्थित हुए चेतनकला से नहीं मिलते तब मन भी स्थित हो जाता है और नहीं रहता । मन चेतनकला और प्राण फुरने बिना नहीं रहता । मन को भी अपनी सत्ताशक्ति कुछ नहीं, स्पन्दरूप जो शक्ति है वह प्राणों को है सो चलरूप जड़ात्मक है और आत्मसत्ता चेतनरूप है और वह अपने आपमें स्थित है । चेतनशक्ति और स्पन्दशक्ति के सम्बन्ध होनेसे मन उपजा है सो उस मन का उपजना भी मिथ्या है । इसी का नाम मिथ्याज्ञान है । हे रामजी! मैंने तुमसे अविद्या जो परम अज्ञानरूप संसाररूपी विष के देनेवाली है कही है । चित्त शक्ति और स्पन्दशक्ति का सम्बन्ध संकल्प से कल्पित है, जो तुम संकल्प न उठाओ तो मन संज्ञा क्षीण हो जावेगी । इससे संसार भ्रम से भयमान् मत हो जब स्पन्दरूप प्राण को चित्तसत्ता चेतती है तब चेतने से मन चित्तरूप को प्राप्त होता है और अपने फुरने से दुःख प्राप्त होता है जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल कल्प कर भयवान् होता है । अखण्ड मण्डलाकार जो चेतनसत्ता सर्वगत है उसका सम्बन्ध किस के साथ हो और अखण्ड शक्ति उन्निद्ररूप आत्मा को कोई इकट्ठा नहीं कर सकता इसी कारण सम्बन्ध का अभाव है । जो सम्बन्ध ही नहीं तो मिलना किससे हो और मिलाप न हुआ तो मन की सिद्धता क्या कहिये? चित्त और स्पन्द की एकता मन कहाती है मन और कोई वस्तु नहीं । जैसे रथ, घोड़ा, हस्ति प्यादा इनके सिवा सेना का रूप और कुछ नहीं, तैसे ही चित्त स्पन्द के सिवा मन का रूप और कुछ नहीं-इस कारण दुष्टरूप मन के समान तीनों लोकों में कोई नहीं सम्यक्‌ज्ञान हो तब मृतकरूप मन नष्ट हो जाता है मिथ्या अनर्थ का कारण चित्त है इसको मत धरो अर्थात् संकल्प का त्याग करो ।हे रामजी! मन का उपजना परमार्थ से नहीं । संकल्प का नाम मन है इस कारण कुछ है नहीं । जैसे मृगतृष्णा की नदी मिथ्या भासती है तैसे ही मन मिथ्या है हृदयरूपी मरुस्थल है, चेतनरूपी सूर्य है और मन रूपी मृगतृष्णा का जल भासता है । जब सम्यक्‌ज्ञान होता है तब इसका अभाव हो जाता है । मन जड़ता से निःस्वरूप है और सर्वदा मृतकरूप है उसी मृतक ने सब लोगों को मृतक किया है । यह बड़ा आश्चर्य है कि अंग भी कुछ नहीं, देह भी नहीं और न आधार है, न आधेय है पर जगत् को भक्षण करता है और बिना जाल के लोगों को फँसाये है । सामग्री से बल, तेज, विभूति, हस्त पदादि रहित लोगों को मारता है, मानों कमल के मारने से मस्तक फट जाता है । जो जड़ मूक अधम हैं वे पुरुष ऐसे मानते हैं कि हम बाँधे हैं, मानों पूर्णमासी के चन्द्रमा की किरणों से जलते हैं । जो शूरमा होते हैं वे उसको हनन करते हैं । जो अविद्यमान मन है उसी ने मिथ्या ही जगत् को मारा है और मिथ्या संकल्प और उदय और स्थित हुआ है । ऐसा दुष्ट है जो किसी ने उस को देखा नहीं । मैंने तुमसे उसकी शक्ति कही है सो बड़ा आश्चर्यरूप विस्तृतरूप है, चञ्चल असत्‌रुप चित्त से मैं विस्मित हुआ हूँ । जो मूर्ख है वह सब आपदा का पात्र है कि मन है नहीं पर उससे वह इतना दुःख पाता है । बड़ा कष्ट है कि सृष्टि मूर्खता से चली जाती है और सब मन से तपते हैं । यह मैं मानता हूँ कि सब जगत् मूढ़रूप है और तृष्णारूपी शस्त्र से कण कण हो गया है, पैलवरूप है जो कमल से विदारण हुआ है, चन्द्रमा की किरणों से दग्ध हो गये हैं, दृष्टिरूपी शस्त्र से बेधे हैं और संकल्प रूपी मन से मृतक हो गये हैं । वास्तव में कुछ नहीं, मिथ्या कल्पना से नीच कृपण करके लोगों को हनन किया है, इससे वे मूर्ख हैं । मूर्ख हमारे उपदेश योग्य नहीं, उपदेश का अधिकारी जिज्ञासु है । जिसको स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ पर संसार से उपराम हुआ है, मोक्ष की इच्छा रखता है और पद पदार्थ का ज्ञाता है वही उपदेश करने योग्य है । पूर्ण ज्ञानवान् को उपदेश नहीं बनता और अज्ञानी मूर्ख को भी नहीं बनता । मूर्ख वीणा की धुनि सुनकर भयवान् होता है और बान्धव निद्रा में सोया पड़ा है, उसको मृतक जानके भयवान् होता है और स्वप्न में हाथी को देखकर भय से भागता है । इस मन ने अज्ञानियों को वश किया है और भोगों का लव जो तुच्छ सुख है उसके निमित्त जीव अनेक यत्न करते हैं और दुःख पाते हैं हृदय में स्थित जो अपना स्वरूप है उसको वे नहीं देख सकते और प्रमाद से अनेक कष्ट पाते हैं । अज्ञानी जीव मिथ्या ही मोहित होते हैं ।

3 comments:

  1. "दीपक तले अन्धेरा" का वास्तविक अर्थ क्या है?.............. जिज्ञासु भाव से जानना चाहता हूँ.

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  2. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

    मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

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  3. Hari om bhai
    aapke dawara jo Bapu g ye sewa karwa rahe hai isse aur sadhaks be jude,aur sewa world wide faile aise shub kamana.
    humara pura sahyog aapke sath hai,aapko sadhuwad
    hariom

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