पूज्य बापूजी के दिव्य दर्शन और भारतीय संस्कृति का सर्वहितकारी ज्ञान

नारायण नारायण नारायण नारायण

Thursday, December 2, 2010


शाण्डिल्य भक्ति सूत्र - Shandilya Bhaktisutr

तृतीय अध्याय प्रथम आह्निक - 3rd Adhyay 1st Aahnik

भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृत्स्नस्य तत्स्वरूपत्वात्‌॥ ८५॥

यह सम्पूर्ण विश्व भजनीय - भगवान से अभिन्न है ; क्योंकि सब कुछ उनका ही स्वरूप है |


तच्चक्तिर्माया जडसामान्यात्‌॥ ८६॥

भगवान की ऐश्वर्य शक्ति का नाम माया है | वह माया भी भगवान से भिन्न नहीं है ; क्योंकि जैसे अन्य जड़तत्त्व भगवत्स्वरूप हैं, वैसे यह माया भी है |

व्यापकत्वाद्वयाप्यानाम्‌॥ ८७॥


भगवान सच्चिदानन्द स्वरूप से सबमें व्यापक हैं ; व्याप्य वस्तुएँ व्यापक का स्वरूप होती हैं ; अतः कुछ भी भगवान से भिन्न नहीं है |

न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्‌॥ ८८॥


(इस संसार की सृष्टि बुद्धिपूर्वक हुई है - सोच-समझकर की गयी है; यह बात इसकी सूक्ष्मता, सृष्टिक्रम, उपयोगिता एवं व्यवस्था को देखते हुए प्रतीत होती है; तो क्या किसी जीव की बुद्धि से इस जगत का निर्माण हुआ है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं- ) नहीं, प्राणियों की बुद्धि से जगत की सृष्टि नहीं हुई है; क्योंकि जीव की स्वल्प बुद्धि के लिये यह असम्भव है (अतः ईश्वर ही इसके स्रष्टा हैं ) |

निर्मायोच्चावचं श्रुतीश्च निर्मिमीते पितृवत्‌॥ ८९॥


ऊँच-नीच अथवा स्थूल-सूक्ष्म भेद वाले समस्त दृश्य-प्रपंच एवं प्राणी वर्ग को उत्पन्न करके भगवान उन्हें हिताहित का परिज्ञान कराने के लिये वेदों का भी निर्माण (प्राकट्य) करते हैं | ठीक वैसे ही, जैसे पिता पुत्रों को उत्पन्न करके उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान कराने के लिये शिक्षा की व्यवस्था करता है |

मिश्रोपदेशान्नेति चेन्न स्वल्पत्वात्‌॥ ९०॥


यदि कहें, 'वेद में धर्ममय यज्ञ-यागादी के साथ कहीं-कहीं हिंसात्मक यागों का भी उपदेश देखा जाता है; अतः अधर्म मिश्रित धर्म का उपदेश देने के कारण ईश्वर पिता के सामान हितकारी नहीं हैं' तो यह धारणा ठीक नहीं है; क्योंकि ऐसी बातें बहुत थोड़ी हैं और वह भी हिंसकों की बढ़ी हुई हिंसा वृत्ति को उन-उन यज्ञों में ही सीमित कर के धीरे-धीरे कम करने के लिये ही वैसी बातें कही गयी हैं | (वास्तव में तो हिंसा का निषेध ही वेद का अभीष्ट मत है |)

फलमस्माद्बादरायणो दृष्टत्वात्‌॥ ९१॥


कर्मों का फल ईश्वर से ही प्राप्त होता है, स्वतः नहीं ; क्योंकि लोक में ऐसा ही देखा गया है | (जैसे कोई अपने कार्य द्वारा राजा आदिको संतुष्ट करता है तो पुरस्कार पाता है और दुर्व्यवहार से उसे रुष्ट करता है तो दण्ड का भागी होता है; इसी प्रकार ईश्वर ही शुभाशुभ कर्मों का सुख-दुःख रूप फल देते हैं | यह बात भगवान वेदव्यास ने (उत्तरमीमांसा -ब्रह्मसूत्र १|१|२ में) कही है |

व्युत्क्रमादप्ययस्तथा दृष्टम्‌॥ ९२॥


विपरीत क्रम से भूतों का अपने कारण में लय होता है, ऐसा ही देखा गया है | ( घट फूटने पर मिट्टी में लीन होता है; इसी प्रकार प्रत्येक व्याप्य वस्तु अपने में व्यापक कारण-तत्त्व में विलीन होती है; यथा पृथ्वी का जल में, जल का अग्नि में, अग्नि का वायु में और वायु का आकाश में लय होता है | )